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Tuesday, June 8, 2010

नदियों के कटाव से प्रभावित हो रहा है गांवों का पर्यावरण

मनुष्य अपने अथक परिश्रम व गाढ़ी कमाई से रोटी, कपड़ा एवं मकान की व्यवस्था सर्वप्रथम करता है लेकिन इस प्रखंड क्षेत्र की भोगोलीक स्थिति इसमें बाधक बन रही है। मुख्य रुप से दो दिशाओं से बहने वाली कनकई व बुढ़ी कनकई नदी प्रतिवर्ष सैकड़ों एकड़ भूमि का क्षरण कर लोगों के सपनों को चकनाचूर कर रही है । स्थिति यह है कि वर्षो से इन नदियों की त्रासदी झेलने को विवश इस क्षेत्र के कई लोग भूमिहीन हो चुके हैं और कुछ इस हालात के कगार पर है । इन नदियों के मुहाने पर बसने वाले सैकड़ों लोगों के पूर्वजं अथवा उनके खुद के द्वारा अर्जित उपजाऊ भूमि सहित उनके आशियानें भी प्रतिवर्ष नदी के आगोस में समा रहे हैं । वहीं बसने वाले लोगों का उस मिट्टी से प्रेम या उनकी मजबूरी उन्हें नदी तट पर रहने को विवश करती है ।

 बताते चले कि प्रखंड क्षेत्र के पूर्वी भाग में कनकई व बुढ़ी कनकई नदी बहती है। जो क्रमश घनटोला करूआमनी, आठगछि, ताराबाड़ी व इकड़ा पंचायतों के दर्जनों गांवों को प्रभावित करती है। वहीं पश्चिमी क्षेत्र में बहने वाली कनकई व कौल नदी सिंधिमारी, लोहागाड़ा, पथरधट्टी पचायतों के गांवों की खेतिहर जमीन का क्षरण प्रतिवर्ष करती है जिससे गंघर्वडांगा, गोरूमारा, दिधिवाड़ी, आठगछिया, दोगच्छी इकड़ा कांटा टप्पु, बलुआडांगी, खड़खडीया कंचनबाड़ी, कोढोबाड़ी, पलसा कचना बालुबाड़ी, काशीबाड़ी मालपरती आदि गांव के किसान व तटवासी प्रभावित हैं । मुखिया आठगछिया, तनबीर आलम मुखिया करूआमनी मंदीप रजक, बहार अली आदि के अनुसार पहले जहां खेती होती थी वहां अब रेत ही रेत है जिसमें प्रतिवर्ष इजाफा ही हो रहा है ।

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