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Thursday, November 12, 2009

तस्करों के जाल में फंसी हैं भारत-नेपाल की सीमा

सीमाओं के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। वरना बूंद बूंद से घड़ा भरता है, यह कहावत एक दिन किशनगंज जिले के नेपाल सीमा पर तस्कर सिद्ध करके दिखा देंगे। मामला नेपाल का माल भारत में और भारत का माल नेपाल में करने के लिए सीमा पर बसे लोगों के प्रयोग से जुड़ा है। इस सवाल पर एसएसबी के सूत्र बताते हैं कि खुफिया विभाग को इस आशय की जानकारी विगत चार-पांच वर्षो से मिल रही है और इससे गृह मंत्रालय को अवगत कराया जाता रहता है। बावजूद इसके सीमांचल की धरती बूंद बूंद की तस्करी के चलते मादक पदार्थो व जाली नोटों से पट रहा है। इसके लिए गंभीर चिंतन की अभी से ही जरूरत है।
आये दिन नेपाल से लगी खुली सीमाओं के जरिए तस्कर जाली नोट, मादक पदार्थ, उर्वरक, हथियार इत्यादि गैर कानूनी चीजें हमारे मुल्क के अंदर दिन प्रतिदिन भेजते या ले जाते हैं। एसएसबी और कस्टम की जब्त सामग्रियों की सूची इसे बताने के लिए पर्याप्त है। उल्लेखनीय है कि उर्वरक, सीमेंट, चावल, डालडा आदि खाद्य पदार्थों की तस्करी करने वाले के माध्यम से नींद व होश उड़ा देने वाली बात तो ये है कि, ये ही लोग चन्द रुपए की मजदूरी में करोड़ों रुपए मूल्य के हेरोइन, अफीम, ब्राउन सुगर के अलावे जाली नोट भी पहुंचा देते हैं।अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में एसएसबी के 21 वीं बटालियन द्वारा दिघलबैंक सीमा पर भारतीयों से जब्त हेरोइन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि दो समय की मुश्किल से रोटी की व्यवस्था करने वाले के पास से 50 लाख रुपए मूल्य की हेरोइन मिलती है।
सूत्र बताते है कि सीमा पर बसे अधिकांश गरीब परिवार तस्करों के संकेत पर कुली की तरह काम कर रहे हैं। दिन भर की मजदूरी का दो-तीन गुना ज्यादा देकर ं सरहद पार बैठे तस्कर भारत के ही लोगों को भारत के खिलाफ जमकर उपयोग भारत के खिलाफ कर रहे हैं। सीमा की रक्षा से जुड़े विशेषज्ञ इसका एक कारण नेपाल की खुली सीमा मानते हैं, जिसे बाड़ के जरिए सील करना अतिआवश्यक है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के आतंकवादी, नेपाल स्थित माओवादी संगठन, बांग्लादेश और चीन में बैठे भारत के दुश्मन भी नेपाल की खुली सीमा का लाभ उठा रहे हैं।

गरीबी उन्मूलन: चौदह वर्ष तक के छात्र मजदूर बनने को विवश

गरीबी उन्मूलन की योजनाओं जमीन पर नही उतर रही हैं या उनका कोई असर गरीब परिवारों पर नही पड़ रहा है । आठ कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते पचास प्रतिशत छात्र स्कूल छोड़ देते हैं। पेट भरने के लिए ये बच्चे क्षेत्र में मजदूरी करते हैं या प्रदेश चले जाते हैं। जिले के मध्य विद्यालयों में छात्रों की घटती संख्या इस तरफ संकेत करती हैं। इस बावत एक सर्वेक्षण की जानकारी देते हुए मध्य विद्यालय चकलाघाट, प्रखंड किशनगंज के अध्यक्ष मो. असरारुल हक अशर्फी और प्रधानाध्यापक मध्य विद्यालय चकला अब्दुल मजीद ने बताया कि उनके स्कूल में कक्षा आठ में कुल 87 बच्चे नामांकित हैं। इसका सबसे अधिक दुखद पहलू यह है कि छात्रों की संख्या छात्राओं की संख्या से आधे से भी कम है। दोनों ने कहा कि यह संकेत करता है कि पचास प्रतिशत छात्र गरीबी से तंग आकर स्कूल छोड़कर मजदूरी करने को विवश हैं या प्रदेश चले गए हैं। गौरतलब है कि कक्षा सात और कक्षा छह में छात्रों की संख्या छात्राओं से अधिक हैं।

देश के नब्बे जिलों में शामिल किशनगंज का विकास अधर में

आनुपातिक दृष्टि से किशनगंज देश के उन 90 जिलों में एक है, जहां अल्पसंख्यकों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है। इन्हीं 90 जिलों में विकास की गंगा प्रवाहित करने के लिए केन्द्र सरकार के मल्टी सेक्टरल डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए डेड़ वर्ष पहले 87.9 प्रतिशत करोड़ की राशि आवंटित किया था जिसमें से 36.017 करोड़ की राशि स्वीकृति है। शेष राशि केन्द्र सरकार के निर्देश के मुताबिक पोजेक्ट नही तैयार होने से लटकी हुई। स्मरणीय है कि स्वीकृत प्रोजेक्टों में शिक्षा, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य एवं इंदिरा आवास के साथ 60 हेल्थ सब सेंटरों में से 12 पर 50.76 लाख रुपये खर्च होना है। इसके अलावा प्राइमरी हेल्थ सेंटर के उन्नयन पर 96 लाख रुपये खर्च होंगे, किन्तु आज तक इस मद में एक भी पैसे की राशि जिले को नही मिली है।