क्षेत्र के भुदान लालकार्ड एवं बिहार सरकार की जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ 2008 के जून माह से शुरू हुआ जिसमें एक ही व्यक्ति का नाम आधे दर्जन लूट के मामले में सामने आया है। जिससे लगता है अवैध कब्जे को लेकर चलाया गया आंदोलन गरीबों एवं भूमिहीनों के हाथों से छिटक गया है। फिलहाल पूरी तस्वीर पुलिस की जांच से ही साफ होगी । पिछले कई माह से चाय बागानों में लूट पाट की घटनाओं पर यदि एक नजर डाली जाय तो यह साफ हो जाएगा कि भूमिहीन आदिवासियों को आगे रखकर क्षेत्र के चाय- बागानों में लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा है।
शुरूआती दिनों में लूट की घटनाओं पर प्रशासन के शिथिल रवैये से चाय बागान मालिक भी बचाव के मुद्दा में रहे परंतु जब पानी सर के ऊपर से बहने लगा और प्रशासन वेट एवं वाच की भूमिका में ही रहा तो तब चाय बागान मालिकों ने आखिरकार कानून का सहारा लेना मुनासिब समझा। सितम्बर माह के पहले पखवाड़े से क्षेत्र के विभिन्न थानों में मामले दर्ज होने प्रारंभ हुए जिनकी संख्या डेढ़ दर्जन के गरीब पहुंच गई है। मामले दर्ज होने के बाद लूट की घटना की सच्चाई भी लोगों के सामने आने लगी। लगभग आधे दर्जन मामले में एक ही व्यक्ति मुख्य अभियुक्त बनाया गया। अपने को भुदानी कार्यकर्ता कहने वाले ऐसे लोग जो अराजकता के जरिए क्षेत्र में अशांति का वातावरण बनाने में सफल हो चुके थे। ।
प्रशासन भी समय रहते सकारात्मक कदम उठाने में विफल रहा जिसका फायदा अराजक तत्वों को मिला तभी तो सज्जन चौधरी, किशन केडीया, दिलीप अग्रवाल, फनीभूषण बसाक, विजय सिंह, अशोक साह, नकूल घोष जैसे बड़े चाय बागानों में लूट के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण लेबियाभिट्टा क सत्यनारायण सिंह जैसे छोटे चाय बागानों में भी लूटपाट की घटना को अंजाम दिया गया। स्थानीय लोगों की यदि माने तो ऐसे मामले में पुरानी रंजिश ही ज्यादा देखी गई, जरूरत है जिला प्रशासन द्वारा ऐसे सकारात्मक पहल करने की जिसमें चाय बागान मालिक, वास्तविक भूमिहीन एवं प्रशासन तीनों मिलाकर मामले का हल निकाले।
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